Sunday, 26 February 2012

वो बचपन कितना अच्छा लगता था ...

आज ईंट और पत्थरों के घर देख कर लगता हैं
बचपन के वो रेत का महल  कितना  सुहावना  था 
आज  वाटर पार्क के पानी में खेल कर लगता हैं
छत पे बारिश के पानी में नहाना कितना लुभावना था

कागज की कश्ती पे घूम आते थे सारा जहाँ
आज सारा संसार, जैसे  लैपटॉप में समाया हैं 
कही ना जा कर भी लगता था दुनिया अपनी हैं 
आज दुनिया घूम कर भी लगता हैं ये जहाँ पराया हैं





कितने खेल होते थे मोहल्ले के ओटलो पर खेलने के लिए
आज ऑफिस से घर पहुचने में शाम ख़त्म होने लगती हैं 
नानी के घर जाकर लगता था काश ये छुटिया ख़त्म न हो
आज अपनो से मिलने में वीकेंड की शाम बर्बाद सी लगती हैं


ढूँढ लेते थे कई खिलोने हम बादलो को देख कर
आज आकाश को ताकने के लिए भी समय निकलना पड़ता हैं
सोते थे जब छत पर तो तारों से भरा आकाश भी कम लगता था,
आज छोटे से कमरों का फ्लेट भी अकेले में दुनिया से बड़ा लगता हैं 





आज दुनिया दारी निभाते निभाते अचानक ही यु लगता हैं
अपने बचपन का वो बचपना कितना अच्छा लगता था
कितना अच्छा लगता था........

Saturday, 4 February 2012

मेरा ये अक्स ही मुज़से हैं ये कहने लगा |

मेरा ये अक्स ही मुझसे हैं ये कहने लगा ।
        तू अपने आप ही में क्यों बहने लगा  ।।
बहुत हैं चाहने वाले मुझे इस दुनिया में ।
       तो तू सबसे जुदा खुद में ही क्यों रहने लगा  ।।
किसे तू खोजना चाहता हैं खुद के भीतर  ।
       किसे तू जानना चाहता हैं अपने ही अन्दर ।। 
कई किताबों के किरदारों में पाया खुद को  ।
       कई फिल्मो की झलकियों से मिलाया खुद को  ।।
पर नहीं हूँ में कही भी किसी के भी जैसा ।
        ये मेरा अक्स ही पूछे के में हूँ कैसा  ।।
मेरा साया भी मिले तो मैं न पहचानूँगा ।
        मैं कभी भी ना मिला खुद से दोस्तों की तरह  ।। 
क्या समाया  हुआ हैं मेरे  दिल में भीतर तलक ।
       ये कभी जान ही ना पाउँगा दूसरो की तरह ।।
जैसे चलती हैं दुनिया खिलोनों की तरह ।
      मैं भी तो चलता हूँ उन्ही की तरह  ।।
सुबह से शाम , शाम से सुबह की तरह ।
      किसी खिलोने में भरी हुई चाबी की तरह  ।।
दो मिनट आँखें जो मूंद कर मैंने सोचा ।
      सोचा भी तो क्या दुनिया के लिए ही  सोचा ।।
कभी दो मिनट भी न निकाले मैंने खुद के लिए ।
     कभी नहीं मैंने खुद के लिए कुछ सोचा ।।