Sunday, 19 November 2017

बेनाम सा रिश्ता - 5

बेनाम  सा रिश्ता अपना बेनाम ही रह गया , यही तो चाहते थे न  तुम और मैं, कुछ कहानिया अंत तक  न ही पहुंचे तो अच्छा हैं ... वक़्त के साथ सब धूमिल हो जाये , धुंधला जाये... न तुम मेरी तरफ उन निगाहो से देखो, न ही मैं तुमसे उन निगाहो की उम्मीद रखूँ ...   कभी कही किसी मोड़ पर मिल जाओ तो मुस्कुरा के मिलो बस इतना ही चाहती हु मैं  अब।  बचपना , लड़कपन या जो कुछ भी था अच्छा था... एहसास था... जो बिना नाम के भी बहुत मायने रखता था...  उसकी वही एहमियत बनी रहे इसलिए इसे यही ख़त्म करते हैं ।
Good luck and Good bye... किस्मत  ने चाहा , तो फिर मिलेंगे...  नए एहसासो के साथ...