Sunday, 17 December 2017

कविता और इतिहास

कविताएँ हैं मेरी इतिहास सी ,
कुछ पुराने एह्सास सी ,
कुछ अनुभवों के राग सी,
कुछ अनधुले से दाग सी ,

कविताएँ हैं मेरी इतिहास सी  |

सजाती हूँ जिसे मैं शब्दों से ,
रचाती हूँ जिसे मैं लफ़्जो से ,
कुछ बीते पलों की सुनाती  हूँ
कुछ छूटे लम्हो को सजाती हूँ ,
एक छोटा इतिहास बनाती  हूँ ,
फिर एक कविता रचाती  हूँ
और बस यही दोहराती हूँ,

कविताएँ हैं मेरी इतिहास सी ,
कुछ अनुभवों के राग सी | 

दोनों उतरे कलम की स्याही से ,
दोनों तथ्यों से भरे हुए ,
कुछ भावनाओ से ओत प्रोत ,
कुछ अनुभवों से भरे हुए ,
वाह और दाद से परे कहीं ,
कभी पूर्ण कभी अधूरी सी ,

कविताएँ हैं मेरी इतिहास सी ,
कुछ अनुभवों के राग सी |

वीणा 





Sunday, 19 November 2017

बेनाम सा रिश्ता - 5

बेनाम  सा रिश्ता अपना बेनाम ही रह गया , यही तो चाहते थे न  तुम और मैं, कुछ कहानिया अंत तक  न ही पहुंचे तो अच्छा हैं ... वक़्त के साथ सब धूमिल हो जाये , धुंधला जाये... न तुम मेरी तरफ उन निगाहो से देखो, न ही मैं तुमसे उन निगाहो की उम्मीद रखूँ ...   कभी कही किसी मोड़ पर मिल जाओ तो मुस्कुरा के मिलो बस इतना ही चाहती हु मैं  अब।  बचपना , लड़कपन या जो कुछ भी था अच्छा था... एहसास था... जो बिना नाम के भी बहुत मायने रखता था...  उसकी वही एहमियत बनी रहे इसलिए इसे यही ख़त्म करते हैं ।
Good luck and Good bye... किस्मत  ने चाहा , तो फिर मिलेंगे...  नए एहसासो के साथ... 

Monday, 24 April 2017

बेनाम सा रिश्ता - 4

जानती हूँ मैं , कितना बुरा लग रहा हैं तुम्हे।  मैं दिल से नहीं चाहती तुम्हे नजर अंदाज करना , पर मजबूर हूँ।  अपने आपको बड़ा ही practical सझती हूँ न मैं। पर गलती मेरी नहीं हैं, तुमने ही सिखाया हैं कई बार 'Be practical' , अब तुम खुद ही बुरा मान रहे हो। अंदर ही अंदर मुझे भी बुरा लग रहा हैं, पर मैं कामयाब कोशिश कर लेती हूँ छुपाने की , तुम्हारी तरह नहीं, चीड़ कर, गुस्सा कर के,  चेहरे पर दिखा दूँ। कोई समझे या न समझे मैं समझती हूँ , भाव पढ़ लेती हूँ तुम्हारे चेहरे के।
Please ऐसे चेहरा उतार कर मत घूमो और दोस्तों पर ऐसे चीड़ चीड़ और गुस्सा मत करो। मैं जानती हूँ तुम्हे बुरा लग रहा हैं मेरे ऐसे behavior से , समझो न मुझे।  कुछ मेरी भी मजबूरिया होंगी जो मैं इस रिश्ते को acceptनहीं कर सकती।अगर तुम भी नहीं समझोगे तो कहा जाउंगी मैं , किसे बतलाऊँगी , ,क्या बतलाऊँगी नाम भी तो नहीं हैं कुछ इस रिश्ते का.

बेनाम सा रिश्ता - 3

उफ़..... इतनी  पास से भी कोई गुजरता है क्या किसी के? हलचल सी मच जाती हैं।
अभी रेडियो पर गाना सुना , बिलकुल सही बैठता है तुम्हारे लिए , ''सिर्फ एहसास है ये रूह का महसूस करो, हाथ से छू कर इसे रिश्तो का इलज़ाम न दो."
कितनी बाते करते हो न तुम दुनिया के सामने और मेरे साथ, मुँह में दही जम जाता है। मैं बोलती रहती हूँ हमेशा की तरह, पता नहीं तुम सुनते भी हो ठीक से या नहीं, और जवाब मांगो तो कहते हो , मैं क्या बोलु। हाँ अब ये भी मैं  बताऊँ ? कितनी शिकायते हैं मुझे तुमसे , पर सब अपने दिल में दबा लेती हूँ , क्योकि कोई हक़ नहीं हैं न, क्योकि कोई रिश्ता नहीं हैं  (शायद हैं पर मैं मानना नहीं चाहती या डरती हुँ शायद उसे कोई नाम देने से, इसलिए बेनाम रखना चाहती हुँ )
अब मैं डरने  लगी हूँ , तुमसे नहीं , खुद से, अब मैं खुद धीरे धीरे अपने आप में इस बेनामी को नाम देने लगी हूँ।  वही नाम जिससे डरती  हूँ। समझ रहे हो न तुम ? ?



Tuesday, 11 April 2017

बेनाम सा रिश्ता -2

देखा.....  कहा था ना मैंने हँसोगे तुम...... क्या कह रहे थे? प्यार हो गया हैं मुझे तुमसे ?  चलो जाओ... प्यार होता तो नाम ना दे देती अपने रिश्ते को, बेनाम क्यों पुकारती ? कुछ एहसास भर है ये जिसे न तुम समझ पाओगे ना मैं समझना चाहती हूँ।  रहने देते हैं ना, ऐसा ही एहसास वाला रिश्ता, बिना किसी नाम का , बेनाम सा रिश्ता।  चलो अब मेरे बारे में सोचना छोडो और अपने काम पर ध्यान दो... वरना कही तुम्हे मुझसे प्यार ना हो जाये... जो मैं बिलकुल नहीं चाहती... 

Monday, 10 April 2017

बेनाम सा रिश्ता -1

तुमसे, हाँ तुमसे |  पता नहीं कैसे जुड़ गया ये बेनाम सा रिश्ता। मैंने  तो नहीं चाहा था और न ही तुमने, पर  फिर भी ये सोच कर कि जो होता हैं अच्छे के लिए होता हैं, जुड़ते गए हम,  पता नहीं कैसे , हमने तो नहीं चाहा था ना।  रोक लेती हूँ मैं खुद को , पर खयालो का क्या करे? वो तो पंख फैलाये उड़ते रहते हैं तुम्हारे खयालो में , बेपरवाह से।तुम ही बताओ अब कैसे रोकू उन्हें ? काश खयालो के लिए भी data ऑफ कर देने का कोई option होता, बंद कर सो जाती चैन की नींद, और कभी धीरे से ऑनलाइन आ कर तुम्हारे खयालो को भी check कर लेती की ये भी उड़ रहे हैं या सो गए हो तुम भी चैन से.

मुस्कुराओगे तुम ये सब पढ़ कर , शायद पागल की उपाधि भी दे दोगे , क्योकि तुम्हे तो शौक हैं ना , ये जताने का की तुम्हे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। पर मैं जानती हूँ तुम मानो या ना मानो , तुम्हे फ़र्क पड़ता हैं.

हाँ शायद,  मैं जानने लगी हूँ तुम्हें ।शायद....

Saturday, 11 March 2017

Women's Day

"शांता कल प्लीज जल्दी आ जाना ना, मुझे  साड़ी पहन कर ऑफिस जाना है.... थोड़ी मदद कर देना.. ठीक हैं "
"जी दीदी ठीक है"

"दीदी ! आज क्या हैं ? आज आपको साड़ी क्यों पहन कर जाना हैं ? कोई त्यौहार हैं क्या?"
"हाहाहा ! हाँ त्यौहार ही समझ ले... चल अब सब काम निपटा ले.. मैं निकलती हूँ."
"जी दीदी"
"और सुन, आज शाम को जल्दी आ कर इनका और चीनू का खाना बना देना".
"जी"
"अरे हाँ, सुन ना, आज ६  बजे चीनू की बस आएगी तो उसको बस से लेकर घर छोड़ देना, तू शर्मा जी घर आती हैं ना 6 बजे? प्लीज आज ऑफिस से आ नहीं पाऊँगी, पार्टी हैं  आज शाम को."
"जी दीदी जी"

आज शांता को सारे घरो का काम निपटने में बहुत देर हो गयी. सारी ऑफिस वाली दीदियों के यहाँ कुछ ज्यादा ही काम था.. पता नहीं ऐसा कौन सा त्यौहार था... जो सभी को सज धज कर ऑफिस जाना था...
घर पहुच कर खाना बनाया पति और बच्चो को खिलाया सब काम ख़तम करते करते कब 12 बज गयी मालूम ही नहीं पड़ा , कल फिर से वही सुबह ६ बजे से काम चालू.
क्यों आते हे ऐसे त्यौहार जिसमे दीदियों को सजना पड़े और खुद के ही घर के काम के लिए मेरे जैसी बाइयो को जिम्मेदारी देना पड़े. पता नहीं क्या था? ज्यादा ही थक गयी थी आज वो इस चक्कर में.
रमेश ने शांता से पूछा: "आज ज्यादा काम था क्या?"
शांता: "हाउ ना... कुछ त्यौहार था आज ... क्या बोली थी दीदी.. Women's day था ... बढ़िया बढ़िया गिफ्ट्स मिले उन लोगो को आज. अपने को क्या पता बड़े लोगो के रोज नए कुछ डे होता हैं और काम मेरा बढ़ जाता हैं ... चल सो जाएं  कल फिर जाना हैं काम पर"