लंबी लंबी पलकों में छुपी वो दो आंखें , ऐसी लगी,
जी हां,तुम्हारी आंखें मुझे , सीप के मोती जैसी लगी।
पूजा घर में जब तुम, ध्यान में बैठे दिखे,
जी हां , तुम मुझे , मेरे प्रिय शिव जैसे लगे,
चमक थी जो काया में, उसे मैं निहारने लगी,
जी हां , वो काया मुझे, दमकते चांद जैसी लगी।
सुंदर बालाओ को देख, जब तुम मुस्कुराने लगे,
जी हां ,तुम मुझे , लिलामय कृष्ण जैसे लगे,
आंखों में जो शरारत थी, वो देख मैं जलने लगी,
जी हां , वो शरारत मुझे , चितचोर जैसी लगी।
हमारे वाद- विवादों में से, जब तुम , विवाद हटाने लगे,
जी हां , तुम मुझे , श्री राम जैसे लगे,
बचपन से जो सुनी थी जो पंक्ति, राम स्तुती में,
" मनु जाहिं राचेउ मिलही सो बरु सहज सुंदर संवरो,
करुणा निधान सुजान सील सनेह जानत रावरो"
इन पंक्तियों में छुपे व्यक्तित्व जैसे लगे,
जी हां, तुम मुझे हूबहू वैसे लगे।
वीणा