Wednesday, 19 January 2022

हम उनसे जब उनकी तरह मिले ,

हाँ कसम से उन्हें अच्छे नहीं लगे 

जब तक लबों पर मुस्कराहट थी ,

बहुत अच्छे हुआ करते थे हम 

जरा नाराजगी क्या जताई 

हम उन्हें सच्चे नहीं लगे 



Sunday, 15 April 2018

सीता होती जो तेरी मैं, रावण से तुम भीड़ जाते,
मैं कोई नहीं तेरी दाता , जो मुझे बचाने तुम आते।
द्रोपदी सी होती सखा तेरी , तुम चिर हरण रुकवा जाते,
मैं कोई नहीं तेरी मोहन , जो मुझे बचाने तुम आते।

तुझसे नाता जोड़ सकूं मैं, वो उमर ना मैंने पाई थी,
मैं तो जंगल जंगल बस , तेरे पशु चराने आयी थी।
रिश्ता होता मुझसे कुछ, क्या तभी प्रकट तुम हो पाते,
मैं कोई नहीं तेरी दाता, जो मुझे बचाने तुम आते।

घात लागए राक्षस को , मैं तो  ना पहचान पाई थी,
पर क्या मुझ जैसी समझ , तुझमें भी समाई थी।
प्रहलाद जो होती मैं तेरी , तुम खंबा तोड़ निकाल आते,
मैं कोई नहीं तेरी दाता, जो मुझे बचाने तुम आते।

नाम लिया खुदा का जो, क्या  पर तू नाराज हुआ,
पर तुझे पूजने वाली का भी, मुझ जैसा ही तो हाल हुआ।
बेटा होती जो इब्राहिम का, क्या बली तभी तुम रुकवाते,
मैं कोई नहीं तेरी भी खुदा, जो मुझे बचाने तुम आते।
वीणा

Monday, 26 March 2018

तुम

लंबी लंबी पलकों में  छुपी वो दो आंखें  , ऐसी लगी,
जी हां,तुम्हारी आंखें मुझे , सीप के मोती जैसी लगी।

पूजा घर में जब तुम, ध्यान में बैठे दिखे,
जी हां , तुम मुझे , मेरे प्रिय शिव जैसे लगे,
चमक थी जो काया में, उसे मैं निहारने लगी,
जी हां , वो काया मुझे, दमकते चांद जैसी लगी।

सुंदर बालाओ को देख, जब तुम मुस्कुराने लगे,
जी हां ,तुम मुझे , लिलामय कृष्ण जैसे लगे,
आंखों  में जो शरारत थी, वो देख मैं जलने लगी,
जी हां , वो शरारत मुझे , चितचोर जैसी लगी।

हमारे वाद- विवादों  में से, जब तुम , विवाद हटाने लगे,
जी हां , तुम मुझे , श्री राम जैसे लगे,
बचपन से जो सुनी थी जो पंक्ति, राम स्तुती में,
" मनु जाहिं राचेउ मिलही सो बरु सहज सुंदर संवरो,
करुणा निधान सुजान सील सनेह जानत रावरो"
इन पंक्तियों में छुपे व्यक्तित्व जैसे लगे,
जी हां, तुम मुझे हूबहू वैसे लगे।

वीणा

Wednesday, 7 March 2018

Women's Day


आज ऑफिस में सब जगह pink balloons लगे थे , सब जगह एक त्यौहार जैसा माहोल था, हो भी क्यों नहीं, आज Women's Day जो हैं ।
आज ऑफिस में  women employees  के लिए games , movies ,  cake cutting , gifts बहुत कुछ था।
Priya ऑफिस आयी , mails check  किये और pantry की ओर निकल ली।
जाते जाते विवेक से बोल गयी , यार क्लाइंट साइड से मेल आये तो message कर देना मैं अंदर आ जाउंगी।
और फिर पूरा दिन टीम की लड़किया बाहर ही रहीं। थोड़ी देर के लिए आती डेस्क टॉप पर एक दो छोटे मोटे काम निपटाती और निकल जाती।  लड़को में थोड़ी जलन की भावना तो थी पर क्या करे आज Women's Day जो है।

शाम के 7 बज रहे थे।  office की लड़कियों के dinner का program  भी था , तो almost सब जा चुकी थीं , या निकल रही थी।  इतने में रवि जो Priya और विवेक का manager था, आया और विवेक से Daily task Details ली।
और निकलते निकलते बोल गया की , अरे Priya को एक पीपीटी complete करना थी, आज तो madam Women's Day मना रही हैं , तुम ही बना देना यार, रात को मुझे Mike को presentation देना हैं , 11 बजे तक।

'अरे यार आज भी 10 बजे तक रुकू मैं , वो भी किसी और के काम के कारण, और वो खुद पार्टी एन्जॉय कर रही है , Women's Day है भाई आज तो , equality का दिन'

और अंदर ही अंदर सोच रहा था , जिन्हे बचपन से equality मिली  हो , क्या उन्हें भी इन सब की जरुरत हैं? या आज भी जो दिन भर मजदूरी करती हैं और जिसका पति उसे मार कर सारे पैसे छीन लेता हैं , या जो बच्चियां पढ़ नहीं पाती , या जो औरतें घरेलु हिंसा की शिकार होती हैं उन्हें ज्यादा जरुरत हैं। साला ये भी हमारे देश के कानून जैसा हो गया है , जिसे फायदा मिलना चाहिए उन्हें मिलता हैं ठेंगा , और जिन्हे इसकी जरुरत नहीं उन्हें मिलता है सारा फुटेज।

Sunday, 11 February 2018

खामोशियों की रफ्तार , बहुत तेज होती है।

पहली मुलाक़ात हो तो, दिल छू जाती है,
और आखरी हो तो , दिल चीर जाती है।

पहला प्यार हो तो , एहसास छुपा जाती है,
दूसरा हो तो, कुछ राज़ छुपा जाती है।

खामोशियों की रफ्तार , बहुत तेज होती है।

शाम की ख़ामोशी , रात में तब्दील हो जाती है,
और रातों की, सन्नाटे में  घुल जाती है।

दोस्ती में खामोशी, घाव दे जाती है,
और दुश्मनी में, वार का अंदाज बयां कर जाती है।

खामोशियों की रफ्तार , बहुत तेज, धार दार होती है।

आंखो से  बयां हो तो, इश्क बन जाती हैं,
आंसू से बयां हो तो, ज़फा बन जाती हैं।

कभी दिल को ठंडक दे कर, सुकून बन जाती है,
कभी सांसों में भर कर, चुभन बन जाती हैं।

खामोशियों की रफ्तार , बहुत तेज होती है।


Wednesday, 10 January 2018

हां,  हूं मैं बेपरवाह,

ख्वाहिशों को जिम्मेदारी नहीं मानती,
शायद इसलिए, हां हूं मैं बेपरवाह।

अस्त व्यस्त सी चीजें जिंदा होने का एहसास कराती हैं मुझे,
शायद इसलिए, हां हूं मैं बेपरवाह।

चीजों से प्यार नहीं करती, क्योंकि इंसानों का मोह काफ़ी है मेरे लिए,
शायद इसलिए, हां हूं मैं बेपरवाह।

भूल आती हूं समान अपनी मां के घर, क्योंकि यादें समेटना जरुरी है मेरे लिए,
शायद इसलिए, हां हूं मैं बेपरवाह।

काम छोड़ कर गाने नाचने लगती हूं,क्योंकि बचपना प्यारा है मुझे,
शायद इसलिए, हां हूं मैं बेपरवाह।

खो जाती हूं फोन और किताबों में  कहीं, क्योंकि एक अलग दुनिया में खोना पसंद है मुझे,
शायद इसलिए, हां हूं मैं बेपरवाह।
© वीणा

Sunday, 7 January 2018

मैं और तुम

हम एक से हैं पर अलग अलग 
हैं एक ज़मीं और एक फ़लक़ 

तुम book shelf से जमे हुए, मैं अस्त व्यस्त सा बस्ता हूँ ,
तुम बड़े writer के novel से, मैं लघु कथा का हिस्सा हूँ  ,
तुम रामायण महाभारत से , मैं देव कथा का भाग हूँ 
तुम dd news से सधे हुए , मैं एक सनसीखेज किस्सा हूँ 

हम एक से हैं पर अलग अलग 
हैं एक ज़मीं और एक फ़लक़ 

तुम internet पे wikipidea , मैं viral होती पोस्ट हूँ,
तुम syllabus की पूरी book, मैं कुंजी  वाली दोस्त हूँ,
तुम एक मुस्कुराती परिभाषा , मैं ठिठोली वाला example 
तुम party organizer से serious, मैं बेपरवाह सी host हूँ

हम एक से हैं पर अलग अलग 
हैं एक ज़मीं और एक फ़लक़ 

तुम छप्पन भोग का पूरा थाल , मैं चाट पकोड़ी जैसी हूँ ,
तुम अलार्म से सधे हुए , मैं snooz button की सुस्ती हूँ 
तुम भीमसेन के अलाप से , मैं हनी सिंह वाली  rap हूँ 
 तुम school के अनुशासन से , मैं कॉलेज वाली मस्ती हूँ 

मैं और तुम जब मिल जाते तो बन जाते हैं हम 
हम एक से हैं पर अलग अलग 
हैं एक ज़मीं और एक फ़लक़