आज ईंट और पत्थरों के घर देख कर लगता हैं
बचपन के वो रेत का महल कितना सुहावना था
बचपन के वो रेत का महल कितना सुहावना था
आज वाटर पार्क के पानी में खेल कर लगता हैं
छत पे बारिश के पानी में नहाना कितना लुभावना था
कागज की कश्ती पे घूम आते थे सारा जहाँ
आज सारा संसार, जैसे लैपटॉप में समाया हैं
कही ना जा कर भी लगता था दुनिया अपनी हैं
आज दुनिया घूम कर भी लगता हैं ये जहाँ पराया हैं
कितने खेल होते थे मोहल्ले के ओटलो पर खेलने के लिए
कितने खेल होते थे मोहल्ले के ओटलो पर खेलने के लिए
आज ऑफिस से घर पहुचने में शाम ख़त्म होने लगती हैं
नानी के घर जाकर लगता था काश ये छुटिया ख़त्म न हो
आज अपनो से मिलने में वीकेंड की शाम बर्बाद सी लगती हैं
ढूँढ लेते थे कई खिलोने हम बादलो को देख कर



ma kasam dil jeet liya baddi ek number bachpan ki yad dila di wo kagaj ki kasti aur mummy ki godh me sar rakh k sona......... awesome...........
ReplyDeleteThanks bhaiya...
DeleteAwesome poem :)
ReplyDeletecan i share it ???
ReplyDeleteBeautiful Exprrssion veenu..1000 likes <3
ReplyDeleteज्यादा कठिन नही है बचपन मे जाना समय दो अपने आपको कम कमाओ पर समय बचाओ
ReplyDeleteJai Gurudev... :P
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