Monday, 24 April 2017

बेनाम सा रिश्ता - 3

उफ़..... इतनी  पास से भी कोई गुजरता है क्या किसी के? हलचल सी मच जाती हैं।
अभी रेडियो पर गाना सुना , बिलकुल सही बैठता है तुम्हारे लिए , ''सिर्फ एहसास है ये रूह का महसूस करो, हाथ से छू कर इसे रिश्तो का इलज़ाम न दो."
कितनी बाते करते हो न तुम दुनिया के सामने और मेरे साथ, मुँह में दही जम जाता है। मैं बोलती रहती हूँ हमेशा की तरह, पता नहीं तुम सुनते भी हो ठीक से या नहीं, और जवाब मांगो तो कहते हो , मैं क्या बोलु। हाँ अब ये भी मैं  बताऊँ ? कितनी शिकायते हैं मुझे तुमसे , पर सब अपने दिल में दबा लेती हूँ , क्योकि कोई हक़ नहीं हैं न, क्योकि कोई रिश्ता नहीं हैं  (शायद हैं पर मैं मानना नहीं चाहती या डरती हुँ शायद उसे कोई नाम देने से, इसलिए बेनाम रखना चाहती हुँ )
अब मैं डरने  लगी हूँ , तुमसे नहीं , खुद से, अब मैं खुद धीरे धीरे अपने आप में इस बेनामी को नाम देने लगी हूँ।  वही नाम जिससे डरती  हूँ। समझ रहे हो न तुम ? ?



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