मेरा ये अक्स ही मुझसे हैं ये कहने लगा ।
तू अपने आप ही में क्यों बहने लगा ।।
बहुत हैं चाहने वाले मुझे इस दुनिया में ।
तो तू सबसे जुदा खुद में ही क्यों रहने लगा ।।
किसे तू खोजना चाहता हैं खुद के भीतर ।
किसे तू जानना चाहता हैं अपने ही अन्दर ।।
कई किताबों के किरदारों में पाया खुद को ।
कई फिल्मो की झलकियों से मिलाया खुद को ।।
पर नहीं हूँ में कही भी किसी के भी जैसा ।
ये मेरा अक्स ही पूछे के में हूँ कैसा ।।
मेरा साया भी मिले तो मैं न पहचानूँगा ।
मैं कभी भी ना मिला खुद से दोस्तों की तरह ।।
क्या समाया हुआ हैं मेरे दिल में भीतर तलक ।
ये कभी जान ही ना पाउँगा दूसरो की तरह ।।
जैसे चलती हैं दुनिया खिलोनों की तरह ।
मैं भी तो चलता हूँ उन्ही की तरह ।।
सुबह से शाम , शाम से सुबह की तरह ।
किसी खिलोने में भरी हुई चाबी की तरह ।।
दो मिनट आँखें जो मूंद कर मैंने सोचा ।
सोचा भी तो क्या दुनिया के लिए ही सोचा ।।
कभी दो मिनट भी न निकाले मैंने खुद के लिए ।
कभी नहीं मैंने खुद के लिए कुछ सोचा ।।
सुबह से शाम , शाम से सुबह की तरह ।
किसी खिलोने में भरी हुई चाबी की तरह ।।
दो मिनट आँखें जो मूंद कर मैंने सोचा ।
सोचा भी तो क्या दुनिया के लिए ही सोचा ।।
कभी दो मिनट भी न निकाले मैंने खुद के लिए ।
कभी नहीं मैंने खुद के लिए कुछ सोचा ।।
Awasome......:)
ReplyDeleteThanks Kaushik.... :)
Deletesuperb .... more dan awesome ....
ReplyDeleteThanks Saurabh... :)
Deletenice one...
ReplyDeleteThanks Piyush... :)
Deleteबढ़िया
ReplyDeletethanks dear
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