Saturday, 4 February 2012

मेरा ये अक्स ही मुज़से हैं ये कहने लगा |

मेरा ये अक्स ही मुझसे हैं ये कहने लगा ।
        तू अपने आप ही में क्यों बहने लगा  ।।
बहुत हैं चाहने वाले मुझे इस दुनिया में ।
       तो तू सबसे जुदा खुद में ही क्यों रहने लगा  ।।
किसे तू खोजना चाहता हैं खुद के भीतर  ।
       किसे तू जानना चाहता हैं अपने ही अन्दर ।। 
कई किताबों के किरदारों में पाया खुद को  ।
       कई फिल्मो की झलकियों से मिलाया खुद को  ।।
पर नहीं हूँ में कही भी किसी के भी जैसा ।
        ये मेरा अक्स ही पूछे के में हूँ कैसा  ।।
मेरा साया भी मिले तो मैं न पहचानूँगा ।
        मैं कभी भी ना मिला खुद से दोस्तों की तरह  ।। 
क्या समाया  हुआ हैं मेरे  दिल में भीतर तलक ।
       ये कभी जान ही ना पाउँगा दूसरो की तरह ।।
जैसे चलती हैं दुनिया खिलोनों की तरह ।
      मैं भी तो चलता हूँ उन्ही की तरह  ।।
सुबह से शाम , शाम से सुबह की तरह ।
      किसी खिलोने में भरी हुई चाबी की तरह  ।।
दो मिनट आँखें जो मूंद कर मैंने सोचा ।
      सोचा भी तो क्या दुनिया के लिए ही  सोचा ।।
कभी दो मिनट भी न निकाले मैंने खुद के लिए ।
     कभी नहीं मैंने खुद के लिए कुछ सोचा ।।

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