"शांता कल प्लीज जल्दी आ जाना ना, मुझे साड़ी पहन कर ऑफिस जाना है.... थोड़ी मदद कर देना.. ठीक हैं "
"जी दीदी ठीक है"
"दीदी ! आज क्या हैं ? आज आपको साड़ी क्यों पहन कर जाना हैं ? कोई त्यौहार हैं क्या?"
"हाहाहा ! हाँ त्यौहार ही समझ ले... चल अब सब काम निपटा ले.. मैं निकलती हूँ."
"जी दीदी"
"और सुन, आज शाम को जल्दी आ कर इनका और चीनू का खाना बना देना".
"जी"
"अरे हाँ, सुन ना, आज ६ बजे चीनू की बस आएगी तो उसको बस से लेकर घर छोड़ देना, तू शर्मा जी घर आती हैं ना 6 बजे? प्लीज आज ऑफिस से आ नहीं पाऊँगी, पार्टी हैं आज शाम को."
"जी दीदी जी"
आज शांता को सारे घरो का काम निपटने में बहुत देर हो गयी. सारी ऑफिस वाली दीदियों के यहाँ कुछ ज्यादा ही काम था.. पता नहीं ऐसा कौन सा त्यौहार था... जो सभी को सज धज कर ऑफिस जाना था...
घर पहुच कर खाना बनाया पति और बच्चो को खिलाया सब काम ख़तम करते करते कब 12 बज गयी मालूम ही नहीं पड़ा , कल फिर से वही सुबह ६ बजे से काम चालू.
क्यों आते हे ऐसे त्यौहार जिसमे दीदियों को सजना पड़े और खुद के ही घर के काम के लिए मेरे जैसी बाइयो को जिम्मेदारी देना पड़े. पता नहीं क्या था? ज्यादा ही थक गयी थी आज वो इस चक्कर में.
रमेश ने शांता से पूछा: "आज ज्यादा काम था क्या?"
शांता: "हाउ ना... कुछ त्यौहार था आज ... क्या बोली थी दीदी.. Women's day था ... बढ़िया बढ़िया गिफ्ट्स मिले उन लोगो को आज. अपने को क्या पता बड़े लोगो के रोज नए कुछ डे होता हैं और काम मेरा बढ़ जाता हैं ... चल सो जाएं कल फिर जाना हैं काम पर"
"जी दीदी ठीक है"
"दीदी ! आज क्या हैं ? आज आपको साड़ी क्यों पहन कर जाना हैं ? कोई त्यौहार हैं क्या?"
"हाहाहा ! हाँ त्यौहार ही समझ ले... चल अब सब काम निपटा ले.. मैं निकलती हूँ."
"जी दीदी"
"और सुन, आज शाम को जल्दी आ कर इनका और चीनू का खाना बना देना".
"जी"
"अरे हाँ, सुन ना, आज ६ बजे चीनू की बस आएगी तो उसको बस से लेकर घर छोड़ देना, तू शर्मा जी घर आती हैं ना 6 बजे? प्लीज आज ऑफिस से आ नहीं पाऊँगी, पार्टी हैं आज शाम को."
"जी दीदी जी"
आज शांता को सारे घरो का काम निपटने में बहुत देर हो गयी. सारी ऑफिस वाली दीदियों के यहाँ कुछ ज्यादा ही काम था.. पता नहीं ऐसा कौन सा त्यौहार था... जो सभी को सज धज कर ऑफिस जाना था...
घर पहुच कर खाना बनाया पति और बच्चो को खिलाया सब काम ख़तम करते करते कब 12 बज गयी मालूम ही नहीं पड़ा , कल फिर से वही सुबह ६ बजे से काम चालू.
क्यों आते हे ऐसे त्यौहार जिसमे दीदियों को सजना पड़े और खुद के ही घर के काम के लिए मेरे जैसी बाइयो को जिम्मेदारी देना पड़े. पता नहीं क्या था? ज्यादा ही थक गयी थी आज वो इस चक्कर में.
रमेश ने शांता से पूछा: "आज ज्यादा काम था क्या?"
शांता: "हाउ ना... कुछ त्यौहार था आज ... क्या बोली थी दीदी.. Women's day था ... बढ़िया बढ़िया गिफ्ट्स मिले उन लोगो को आज. अपने को क्या पता बड़े लोगो के रोज नए कुछ डे होता हैं और काम मेरा बढ़ जाता हैं ... चल सो जाएं कल फिर जाना हैं काम पर"
Beautifully written
ReplyDeleteThanks Dear
Deleteawesome..
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