तुमसे, हाँ तुमसे | पता नहीं कैसे जुड़ गया ये बेनाम सा रिश्ता। मैंने तो नहीं चाहा था और न ही तुमने, पर फिर भी ये सोच कर कि जो होता हैं अच्छे के लिए होता हैं, जुड़ते गए हम, पता नहीं कैसे , हमने तो नहीं चाहा था ना। रोक लेती हूँ मैं खुद को , पर खयालो का क्या करे? वो तो पंख फैलाये उड़ते रहते हैं तुम्हारे खयालो में , बेपरवाह से।तुम ही बताओ अब कैसे रोकू उन्हें ? काश खयालो के लिए भी data ऑफ कर देने का कोई option होता, बंद कर सो जाती चैन की नींद, और कभी धीरे से ऑनलाइन आ कर तुम्हारे खयालो को भी check कर लेती की ये भी उड़ रहे हैं या सो गए हो तुम भी चैन से.
मुस्कुराओगे तुम ये सब पढ़ कर , शायद पागल की उपाधि भी दे दोगे , क्योकि तुम्हे तो शौक हैं ना , ये जताने का की तुम्हे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। पर मैं जानती हूँ तुम मानो या ना मानो , तुम्हे फ़र्क पड़ता हैं.
हाँ शायद, मैं जानने लगी हूँ तुम्हें ।शायद....
मुस्कुराओगे तुम ये सब पढ़ कर , शायद पागल की उपाधि भी दे दोगे , क्योकि तुम्हे तो शौक हैं ना , ये जताने का की तुम्हे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। पर मैं जानती हूँ तुम मानो या ना मानो , तुम्हे फ़र्क पड़ता हैं.
हाँ शायद, मैं जानने लगी हूँ तुम्हें ।शायद....
Very nice
ReplyDeleteThank you ,😄
DeleteUnique style of writing. Great work.
ReplyDeleteThank u 😄
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