Wednesday, 10 January 2018

हां,  हूं मैं बेपरवाह,

ख्वाहिशों को जिम्मेदारी नहीं मानती,
शायद इसलिए, हां हूं मैं बेपरवाह।

अस्त व्यस्त सी चीजें जिंदा होने का एहसास कराती हैं मुझे,
शायद इसलिए, हां हूं मैं बेपरवाह।

चीजों से प्यार नहीं करती, क्योंकि इंसानों का मोह काफ़ी है मेरे लिए,
शायद इसलिए, हां हूं मैं बेपरवाह।

भूल आती हूं समान अपनी मां के घर, क्योंकि यादें समेटना जरुरी है मेरे लिए,
शायद इसलिए, हां हूं मैं बेपरवाह।

काम छोड़ कर गाने नाचने लगती हूं,क्योंकि बचपना प्यारा है मुझे,
शायद इसलिए, हां हूं मैं बेपरवाह।

खो जाती हूं फोन और किताबों में  कहीं, क्योंकि एक अलग दुनिया में खोना पसंद है मुझे,
शायद इसलिए, हां हूं मैं बेपरवाह।
© वीणा

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